समय कम किन्तु प्राप्ति ऊँची हो अर्थात मेहनत कम, सफलता हो अधिक

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मनोज श्रीवास्तव
  • मनोज श्रीवास्तव

देहरादून : समय कम किन्तु प्राप्ति उॅची हो। लेकिन ऐसा नही होता है, हम देने के स्थान पर लेने में लगे रहते है। इसलिए चैक करे कि हर समय देने वाले है या कभी कभी देने वाले है या किन्ही किन्ही को देने वाले है या सभी को देने वाले है। कभी कहते है कि चाँद से मिले तो करें फील्ड होगी तो करेगे या सहयोग मिलेगा तब करेंगे।

जो सदा करने वाले होते है उनकी पूजा सदा होती है। लेकिन जो समय और सहायोग के आधार पर चान्स लेते है उनकी यादगार की डेट फिक्स होती है। इसलिए अब अनेक प्रकार के बोझों से हल्के हो जाना है। अपना कोना कोना साफ रखना है। कचड़े को अन्दर ही सम्भाल कर नही रखना हैं क्योकि कचड़ा ही किचड़ को पैदा करता है। किचडे को रखने का अर्थ है उसकी वृद्धि करना। जब किचड़े खाली रहेंगे तभी प्राप्त हुआ खाजना भर सकेंगे।

शरीर का कर्मभोग शूली से कितना भी बडा हो लेकिन अपने को साक्षी समझने से कर्मभोग के वश में नही होंगे। हम कर्मबोझ से कर्मयोग में बदल जायेंगे। कर्मभोग से मुक्त होने का आधार है खुशी। खुशी कर्मभोग को चुकता करने की औषधि है। खुशी हमारे दवाई की खुराक बन जाती है। अगर खुशी है तब कोई भी प्रकृति या माया के आकर्षण हमें आकर्षित नही करेगी और हम हर्षित रहेगे। हर्षित रहना अर्थात सदैव एक संकल्प की स्मृति में रहना। यह संकल्प है, पाना था सो पा लिया, पाने के लिए अब कुछ नही रहा।

हमारा कर्तव्य है सुख देना है और सुख लेना है। यहॅा लेना और देना समान और समानान्तर रूप में चलता है। लेना ही देने के समान है। हम लेते ही है देने के लिए। लेना है ही देने के लिए। इसलिए पहले चैक करें जितना लेते है उतना देते है अथवा लेने के बाद जितना देना है उतना देते है अर्थात लेना और देना समान हो।

महादानी बनना अर्थात हाथ खुला रखना और देने के स्वरूप में रहना। स्थूल सम्पत्ति ही नही बल्कि नालेज की सम्पत्ति और शाक्तियों की सम्पत्ति देने वाले बनना। ऐसा अनुभव हो कि एक सेकेण्ड भी कोई हमारे सामने आ जाये तो भी वह दृष्टि से ऐसा अनुभव करें कि मैने कुछ पाया है। सभी को देना जरूर है क्योकि देने का स्वरूप सूक्ष्म और शक्तिशाली बना देता है।

अव्यक्त बाप-दादा, महावाक्य मुरली 27 जनवरी 1976

लेखक : मनोज श्रीवास्तव, सहायक निदेशक सूचना एवं लोकसम्पर्क विभाग उत्तराखंड