स्वयं से झूठ बोलना हिंसा है, कहते है तेरा लेकिन करते है मेरा

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मनोज श्रीवास्तव

देहरादून : झूठ दो प्रकार के होते है पहला दूसरो से झूठ बोलना और दूसरा है स्वयं से झूठ बोलना। स्वयं से झूठ बोलना आत्मप्रवंचना कहलाता है इसे दार्शनिक भाषा में ठंक थ्ंपजी, आत्मा की बुरी औरी पतीत अवस्था कहते हैं।

ऐसे ही हम झूठ बोलते है कहते है तेरा लेकिन करते है मेरा। कहते हैं हम ट्रस्टी है, सब कुछ आपका है,तन मन और धन सब कुछ तेरा फिर भी मयपन के मोह बस में होकर चलने लगते हैं अर्थात मयपन लाना या मेरा समझना यह भी एक प्रकार का झूठ है। कहना तेरा और करना मेरा यह भी एक प्रकार का झूठ है।

वायदा करते हैं तुम्ही से खाऊ, तुम्ही से बैठू, तुम्ही से बौलू और तुम्ही से सर्वसम्बन्ध निभाऊ लेकिन प्रैक्टिकल में अन्य व्यक्तियों से सम्बन्ध बना लेते है। यह भी एक प्रकार का झूठ है हिंसा है, महापाप है और आत्मघात है। अगर यह सब नही निभाते तो झूठा होता ऐसे ही धोखाधडी और ठगी करना भी हिंसा कहलाता है।

सबसे बड़ा धोखा है स्वयं से झूठ बोलना है। स्वयं को जानते हुए, मानते हुए फिर भी स्वयं को श्रेष्ठ प्राप्ति से वंचित रखना यह भी एक प्रकार का धोखा है। धोखे की निशानी है स्वयं का दुखी होना। कहना एक करना दूसरा, अपनी कमजोरी को छिपा कर बाहर से अपना स्वरूप बदल कर अपने को अच्छा पुरूषार्थी सिद्ध करना यह भी एक प्रकार का झूठ है। और स्वयं को धोखा देना है। अपनी गलती को छिपाना यह भी स्वयं को धोखा देना और स्वयं से ठगी करना है।

संकल्प में भी नियम मर्यादाओ की लकीर के बाहर आना अर्थात आत्मघात, महापाप करना है। इसको देखते हुए प्रातःकाल अमृतबेला से रात सोने तक हर कदम मयादाओं के अनुकूल हमारी स्मृति, वृत्ति और दृष्टि बनी रहे। एक बार ऊंची स्टेज पर पहुंचकर निचे गिरना घात है। आत्मा के असली गुणस्वरूप और शक्ति स्वरूप स्थिति से नीचे आना आत्मघात है। अहिंसक व्यक्ति कभी किसी का खुन नही करता है। खुन करना अर्थात हिंसा करना। इस रूप में हम दिन भर में कई प्रकार के खुन करते हैं। जब हम अपने दिव्य वृद्धि व दिव्य विवेक को भूल कर, परिस्थिति के दवाब में यदि हम अपने ईश्वरीय विवेक को दबाते हैं तो इसे ईश्वरीय विवेक का खुन करना कहते हैं।

हम दिव्य बुद्धि का खुन करते हैं। यह अवस्था तब आती है जब हम बार बार चिल्लाते हैं कि मैं तो चाहता तो नही था पर कर दिया, न चाहते हुए भी हो गया।इसे ईश्वरीय विवेक का खुन करना कहते हैं। झूठ बोलना, चोरी करना, ठगी करना, चोरी करना यह सब हिंसा है अथवा महापाप है। शुद्रपन का संस्कार व स्वभाव धारण करना भी हिंसा है।

अव्यक्त बाप दादा महावाक्य मूरली 15 अक्टूबर 1975

लेखक : मनोज श्रीवास्तव, सहायक निदेशक सूचना एवं लोकसम्पर्क विभाग उत्तराखंड