इंटरनेट डिजिटल का जरूरत से ज्यादा प्रयोग करने से हमारे ब्रेन और सोचने पर होता है असर – मनोज श्रीवास्तव

 इंटरनेट डिजिटल का जरूरत से ज्यादा प्रयोग करने से हमारे ब्रेन और सोचने पर होता है असर – मनोज श्रीवास्तव
Posted on अक्टूबर 3, 2021 12:23 pm
                                                   

मनोज श्रीवास्तव

चिल्ड्रेन पर्सनालिटी ई-कैम्प, डिजिटल वेलनेस

देहरादून : आज की दुनिया में हर कार्य डिजिटल तरीके से हो रहा है। डिजिटल कार्य, ऑफिशियल कार्य, डिजिटल गेम, डिजिटल चौट, डिजिटल शॉपिंग, डिजिटल खाना डिजिटल पढ़ाई आदि सभी डिजिटल तरीके से होने लगा है। लॉकडाउन के समय पर भी डिजिटल के द्वारा ही हम एक दूसरे से कनेक्ट रहे। लेकिन समय के अनुसार टेक्नोलॉजी यूज़ करना अच्छी चीज है लेकिन किसी भी चीज को बहुत ज्यादा यूज करना नुकसान कारक होता है। 
आजकल डिजिटल का ज्यादा प्रयोग करने के कारण, जिस तरह हमारे दिमाग की मेमोरी कार्य करना चाहिए उस हिसाब से कार्य नहीं करती है। डिजिटल तरीके से हमारी मेमोरी लॉस हो जाती है, जिसके परिणाम स्वरूप हमारी मेमोरी क्षमता के कम कार्य करती है। जैसे पहले रिजल्ट आने पर कभी-कभी बर्गर खाते थे। आज घर के सामने दुकान खुल गई तो बर्गर रोजाना खाने लगे तो नुकसान करने लगेगा। ऐसे ही हमारे साथ डिजिटल के द्वारा हो रहा है। एक बटन दबाने से दुनिया से कनेक्ट हो जाते हैं, कुछ भी देख सकते हैं, कर सकते हैं।
आज इंटरनेट पर लगभग 1 लाख फिल्म्स मौजूद है। आप कितना भी देखो यह समाप्त नहीं होगी। इन्टरनेट पर, टीवी चैनल, न्यूज पेपर्स सभी कुछ मौजूद हैं। यदि हम 24 घंटे इन्टरनेट, डिजिटल पर ही बैठे रहे फिर भी सारा कुछ नहीं ले सकते हैं। इसका हमारे दिमाग पर, स्वास्थ्य पर व संकल्पों पर इफेक्ट पड़ता है। बड़े व बच्चों पर इसका बुरा इफेक्ट पड़ता है।
डिजिटल का जरूरत से ज्यादा प्रयोग करने पर हमारे ब्रेन और सोचने पर असर होता है। जब हम डिजिटल यूज करते हैं, खाना भी बीच में खाने लगते हैं, फोन भी अटेंड करने लगते हैं, एक साथ कई कार्य करते हैं जिससे हमारे दिमाग पर असर पड़ता है। और सोचने में अंतर पड़ता है। कभी कुछ, कभी कुछ करने लग जाते हैं। इसके परिणाम स्वरूप ज्यादा समय तक एक संकल्प में नहीं टिक पाते हैं, अर्थात हमारी एकाग्रता अच्छी नही रहती है।  इसके कारण हमें जो याद रखना चाहिए वह याद नहीं रहता है। आज हम मोबाइल पर स्टाग्राम, व्हाट्सएप, टेलीग्राम, फेसबुक, ईमेल व घर का कार्य आदि सभी एक साथ कर रहे हैं। इससे हमारे नेट की स्पीड स्लो हो जाती है। इसी तरह हमारे ब्रेन के साथ होता है। 
इन्टरनेट और डिजिटल के कारण परिवार और संबंधों में असर पड़ता है। जो लोग ज्यादा मोबाइल को यूज़ करते हैं या मल्टीमीडिया से कनेक्ट रहते हैं उनके परिवार में व संबंधों में बिगाड़ की स्थिति आ जाती है। पहले हम थोड़े समय भी घर में रहते थे। तब पेरेंट्स के साथ प्यार रहता था। आजकल हर माता-पिता की शिकायत रहती है कि हमारे बच्चे अपने कमरे में मोबाइल पर लगे रहते हैं और बच्चों की शिकायत रहती है कि हमारे मम्मी पापा मोबाइल पर व लेपटॉप पर लगे रहते हैं। पहले खाना एक साथ खाते थे तब एक दूसरे से बात करते थे आजकल अपने अपने हाथ में मोबाइल होते हुए खाना खाते हैं अर्थात अपने धुन में ही रहते हैं जिससे आपस में प्यार खत्म होता जाता है। 
सोशल मीडिया पर आजकल जितने भी फंक्शन है उन सभी पर हम अपने अपने फोटो शेयर करने लगते हैं। वास्तविकता उनसे पूछा जाए कि उनके अंदर की वैसी ही स्थिति रहती है जैसे फोटो फेक हैं, झूठी है। मोबाइल से ब्लू लाइट निकलती है। हमारे अंदर मेलाटॉनिक हारमोंस होता है वह हारमोंस हमारे ब्रेन को इशारा देता है कि हमारे सोने का टाइम हो गया है। मोबाइल से ब्लू लाइट निकलने वाली उस हारमोंस को स्लो करता है जिससे हारमोंस रिलीज नहीं कर पाता है और ब्रेन सोने के टाइम पर भी एक्टिवेट रहता है जिससे नींद कम हो जाती है, याद करने से भूल जाते हैं अटेंशन कम रहता है। इसके इलाज के रूप में समाधान भी सामने आया है – ब्लू लाइट फिल्टर लगाए जाते हैं, कलरचेंज एप आते हैं उनका यूज कर सकते हैं। ब्लू स्क्रीन की वजह से आंखों पर चश्मा लग गया। पढ़ाई भी ऑनलाइन करना है, प्रेजेंटेशन भी ऑनलाइन करनी है। सभी कुछ ऑनलाइन करना है तो आंखों की परेशानियां बढ़ गई है। ब्लू लाइट की वजह से आंखों की समस्या बढ़ गई है।
जब लगातार कार्य करते तो उस समय आंखें बंद नहीं करते हैं, लगातार करते रहते हैं। पलक झपकाते नहीं है जिससे आंखें जलने लगती है, आंखें सूखने लगती है, सिर में दर्द होने लगता है, आंखों से धुंधला दिखाई देने लगता है। इसके इलाज के लिए 20-20-20 अर्थात 20 मिनट के बाद 20 फीट की दूरी पर स्थित होकर 20 सेकंड के लिए एक स्थिति में देखना है, जिससे आप जो देख रहे थे उससे ब्रेक हो जाता है। यह फार्मूला सभी के लिए लागू होता है। दूसरा आंखों को बंद करना, खोलना अर्थात पलकों को झपकाना जरूर है। जैसे टेनिस एल्बो हो जाता है। वैसे आर्म्स एल्बो हो जाता है। इसमें हमारे हाथ से लेकर कलाई कोनी तक सुन्न होने लगता है। इसके इलाज के रूप में मोबाइल को लगातार यूज न करें, बीच-बीच में ब्रेक दें, मोबाइल को स्टैंड पर लगाएं, लेटकर नहीं करना है, टेबल पर मोबाइल स्टैंड पर लगाकर कार्य करेंगे जिससे आपकी कई समस्याएं ठीक हो जाएंगी।
मोबाइल पकड़ने से हाथों की नसें कमजोर हो जाती है। हम टेक्सटिंग बहुत ज्यादा कर रहे हैं इसलिए अंगूठा, हाथ, कलाई में दर्द होने लगता है। इलाज फोन कसकर न पकड़ें, लगातार न करें। टेक्सटिंग करते समय हमारे हेड का वजन 27 किलो के बराबर हो जाता है। गर्दन झुकी हुई रहती है, उस समय गर्दन पर वजन ज्यादा हो जाता है, जिससे कंधों पर वजन पड़ता है। जिससे राउंड अप हो जाता है। जिसको टेक्स्ट नेक कहा जाता है। अपने बैठने का तरीका सही करना है। टेक्सटिंग टाइपिंग ब्राउज़िंग से पीठ में दर्द होने लगता है, कंधे दर्द करने लगते हैं, छाती में दर्द होने लगता है। हमारी ब्रीथिंग पर असर पड़ता है।
डिजिटल इन्टरनेट के बुरे प्रभाव से बचने के लिए  विशेष सावधानी बरतनेे की जरूरत है। अपने स्क्रीन की ब्राइट को लोएस्ट करें, स्क्रीन की किरणें हमारे ऊपर असर डालती हैं। अपने टाइम को नियम के मुताबिक अरेंज करें। हम कितनी देर फोन कॉल पर बात करते हैं, लैपटॉप पर बात करते हैं, क्योंकि फोन से, लैपटॉप से किरणें निकलती है। फोन से बात करने से ईयर फोन से कनेक्ट हों या स्पीकर पर बात करें, कान पर लगाकर बात न करें। जब किसी को फोन मिलाते हैं, जब तक फोन कनेक्ट नहीं होता है तब तक कान पर ना लगाएं। फोन उठने के बाद फोन को कान से लगाएं या स्पीकर पर बात करें।
हमें स्वयं की चेकिंग करनी है कि हम इस मोबाइल के या लैपटॉप के आदि तो नहीं हो गए हैं। बार-बार फोन को मैसेज के लिए चेक तो नहीं करते हैं। बार-बार फोन को चार्ज करने के लिए चेक तो नहीं करते हैं अर्थात उसके डिजिटल इन्टरनेट के अधीन पूरी तरह बस में होते जाते हैं। इंटरनेट खराब है, स्लो है। फोन पर नोटिफिकेशन की आवाज आती है तब सभी कार्य छोड़ कर उस नोटिफिकेशन को देखते हैं। थोड़ा गेम और खेलना, थोड़ा ब्राउज़र और करना है। आज के टाइम पर बच्चों से मोबाइल ले लिया जाता है तब बच्चे कहते हैं। हम अब क्या करें। समझना है कि फोन के पहले की लाइफ कैसी थी, कैसे जीवन को यूज करते थे।

महत्वपूर्ण ध्यान देने वाली बातें है 

  1. मोबाइल पर अलार्म नहीं लगाना है। अलार्म के लिए घड़ी को यूज करना है।
  2. बेडरूम ई-फ्री रखना है।
  3. मोबाइल के सभी नोटिफिकेशन को स्विच ऑफ करके रखना है।
  4. खाना खाते समय रूम या डाइनिंग टेबल पर मोबाइल साथ न रखें।
  5. दिन का थोड़ा समय अपने परिवार के लिए जरूर रखें।
  6. दिनचर्या का पूरा प्लान/टाइम टेबल बनाएं। इतना समय गेम खेलना, इतना समय पढ़ना है, इतना समय अन्य कार्य करना है।
  7. पूरा दिन या कुछ समय, छः घंटे, आठ घंटे टीवी, मोबाइल, लैपटॉप अर्थात स्क्रीन से दूर रहें।
डिजिटल के जितने भी उपकरण है उन सभी उपकरणों से से दूर रहने के लिए मेडिटेशन एक सहज तरीका है। यह सभी टेक्नोलॉजी हमारे लिए बनी हैं। हम उसका प्रयोग करते भी हैं लेकिन मेडिटेशन से हमारा दिमाग चार्ज हो जाता है जिससे हम ताजगी महसूस करते हैं। हमें रोजना मेडिटेशन सुबह, शाम व दिन में समय मिलने पर अभ्यास करने से हमारा दिमाग मास्टरमाइंड बन जाता है। ब्रहमाकुमारी संस्था द्वारा आयोजित बच्चों के व्यक्तित्व विकास और मानसिक मनोबल को ध्यान में रखते हुए डिजिटल वेलनेस विषय पर बी.के. डॉ अदिति सिंघल दीदी द्वारा ऑन लाईन सेशन क्लास में लैक्चर दिया गया। ब्रहमाकुमारी संस्थान द्वारा चिल्ड्रेन पर्सनालिटी ई-कैम्प में विभिन्न विषयों पर प्रतिदिन जूम एप के माध्यम से ऑन लाईन क्लास में दिया जा रहा है। जूम आई डी-98921668494 है जिसमें पासवर्ड जरूरत नही है।

लेखक : मनोज श्रीवास्तव, उपनिदेशक प्रभारी मीडिया सेंटर विधानसभा देहरादून।

Related post