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राशिफल व पञ्चांग 17 फरवरी 2019

16-02-2019 19:13:06

नेशनल हैल्थ अकाउंट्स (एनएचए) के अनुसार 2014-15 के आंकड़ों से पता चलता है कि कुल आउट-ऑफ-पॉकेट स्पेंडिंग (ओओपी) का लगभग 42 प्रतिशत हिस्सा दवाएं खरीदने में खर्च हुआ।

 

 एनएसएसओ और एनएफएचएस के विभिन्न सर्वेक्षणों से पता चलता है कि 7 प्रतिशत राशि चिकित्सा और डाइग्नोस्टिक लेब पर खर्च की गई।

भारत | केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा प्रकाशित नेशनल हैल्थ अकाउंट्स (एनएचए) के नवीनतम आंकड़ों से पता चलता है कि भारतीय परिवारों पर सबसे ज्यादा वित्तीय बोझ दवाओं का है। भारतीय परिवारों द्वारा किये जाने वाले कुल आउट-ऑफ-पॉकेट स्पेंडिंग (ओओपी) का लगभग 42 हिस्सा दवाइयों को खरीदने में खर्च हो जाता है। लोग अपनी जेब से किए जाने वाले खर्च का लगभग 28 प्रतिशत हिस्सा निजी अस्पतालों में खर्च कर देते हैं। कुछ हद तक इस वित्तीय बोझ को कम करने के लिए लोग अब ऑनलाइन माध्यम के जरिए दवाएं मंगाना पसंद करने लगे हैं, क्यांेकि ऐसा करना उन्हें आसान भी लगता है और ऑनलाइन फार्मेसियां निर्धारित दवाओं पर आर्डर से लेकर डिलीवरी तक आकर्षक ऑफर भी प्रदान कर रही हैं।

राजस्थान स्थित एमहैल्थ सेवा प्रदाता, मेरापेशेंट ऐप के संस्थापक और अध्यक्ष श्री मनीष मेहता कहते हैं, ‘‘शारीरिक रूप से अक्षम और बुजुर्ग लोग, जिनके लिए यात्रा एक मुश्किल काम है , उनके के लिए दवाएं ऑनलाइन ऑर्डर करना सुविधाजनक हो गया है। असल में किसी को अब बाहर जाने और एक स्टोर से दूसरे स्टोर तक दुर्लभ दवाओं की तलाश करने की जरूरत नहीं होती। कैंसर और टीबी की दवाएं रोगियों को लंबी अवधि के लिए लेनी होती हैं। ऐसे मामलों में, ऑनलाइन ऑर्डर करते हुए दवाएं मंगाना अपने खर्च को कम करने के लिहाज से भी फायदेमंद है क्योंकि यह दवा कंपनियों और खुदरा विक्रेताओं के बीच सीधा संबंध कायम करता है। इस तरह असाधारण रूप से लंबी आपूर्ति श्रृंखला में भी कटौती हो जाती है जिसके कारण डिस्ट्रीब्यूशन सुपरवाइजर, थोक व्यापारी और फिर खुदरा विक्रेताओं के मार्जिन समाप्त किये जा सकते है।‘‘


श्री मेहता ने आगे कहा, ‘‘जहां तक संचालन का सवाल है, ऑनलाइन चिकित्सा फार्मेसी व्यवस्थित ढंग से संचालित होती है जो दवा अनुमोदन की एक विशिष्ट प्रक्रिया का पालन करती है, जिसमें चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा दवा अनुमोदित की जाती है। यहां मेरापेशेंट ऐप के माध्यम से, हम पारंपरिक बाजार को उपयोगकर्ताओं को उपलब्द्ध कराते हैं जहां वे आस-पास के मेडिकल स्टोर से अपनी निर्धारित दवा का ऑर्डर कर सकते हैं और इस तरह उनका भरोसा भी बरकरार रहता है।‘‘

फार्मा उद्योग की कुल वार्षिक बिक्री 1.2 लाख करोड़ रुपये है। यदि अगले 4 वर्षों में इनमें से 10 प्रतिशत हिस्सा भी ऑनलाइन की तरफ शिफ्ट हो जाता है, तो ई-फार्मेसी उद्योग 10,000 करोड़ रुपये के आंकडे को छूने में कामयाब होगा। उम्मीद है कि अगले 4 वर्षों में भारत में ऑनलाइन फार्मा के कुल ग्राहक 20 मिलियन तक पहुंच जाएंगे। साक्षरता दर में वृद्धि और ज्यादा से ज्यादा लोगों की स्मार्टफोन और कंप्यूटर तक पहुंच होने के साथ ही दवाइयों की ऑनलाइन खरीद निश्चित रूप से रफ्तार पकड़ रही हैं जिससे यह एक ट्रेंड बनता जा रहा है।