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    पंचायत चुनाव विशेष : गॉधीजी के ग्राम स्वराज का क्या होगा ?

    21-07-2019 20:20:56

    पैठाणी/गढ़वाल (देव कृष्ण थपलियाल): राज्य विधान सभा के मानसून सत्र में पारित पंचायत राज एक्ट के मौजूदा प्रावधानों में कुछ फेरबदल कर सरकार नें आगामी पंचायत चुनावों में खडे होंनें वालें प्रत्याशियों के सामनें एक नई बडी  चुनौती पेश कर दी है। निकट भविष्य की छोटी सरकार के लिए अपनीं की नुमांइदगी पेश करने जा रहे, इन उम्मीदवारों के सामनें पहली शर्त यह है की चुनाव लडनें के लिए उनकी पढाई-लिखाई कम से कम दसवीं तक होंनी जरूरी है,  दूसरी शर्त ये है की उम्मीदवार  किसी भी स्थिति में दो से अधिक जीवित बच्चों के मॉ -बाप नही होंनें चहिए  ? माना की पहली वाली (शैक्षिक) शर्त से कुछ समझौता हो सकता है, ये आम धारणा भी है की राजनीति में पढे-लिखे लोंगों का आना जरूरी भी है, राज्य इस सबंध में काफी समृद्व भी है, राज्य की कुल जनसंख्या के 80 फीसदी लोग शिक्षित और साक्षर हैं, बदलते परिवेश में जनप्रतिनिधियो के सामनें जो नियम-कानून अधिकार व शक्तियॉ प्रदान की जा रही है उस लिहाज से जनप्रतिनिधि को थोडा-बहुत पढत-लिखत का ज्ञान होंना ही चाहिए, तथापि  शिक्षित’ होने के तमाम तरीके भी शिक्षा के बाजार में उपलब्ध हैं, वे इस कमीं को पूरा कर सकते हैं, अगली बार इस योग्यता को हासिल कर अपनीं राजनीतिक इच्छा की पूर्ति कर सकते हैं ?  लेकिन सबसे बडी बाधा उन लोंगों के लिए है, जिनके दो से अधिक संतानें हैं ? आखिर वे चुनाव कैसे लड सकते हैं ? इसका मतलब ये हुआ की उनके लिए चुनावी राजनीति के दरवाजे सदा-सदा के लिए बंद हो जायेंगें ?  उनका कसूर महज इतना है की वें दो से अधिक बच्चों के ’पैरैंण्टस्’ हैं ?    

    देव कृष्ण थपलियाल


     राज्य भर से इन त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों में लगभग 50,000 से अधिक जनप्रतिनिधियों का चुनाव किया जाता है, तथा इन चुनावों में प्रतिभाग करनें वाले दूर-दराज के गॉवों, खाल-धारों के ही स्थानीय लोंग होतें हैं, जिन्हें इन धार-खालों के तमाम गढढों, झॉड-झंकारों और टेढे-मेढे रास्तों का अच्छी तरह से पता है, इसलिए समय आनें पर वे अपनें नेता, मंत्री व स्थानीय विधायकों को अच्छी तरह समझा भी देते हैं।  लोकतंत्र और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की जानकारी से भी वे यही से दूरूस्त होते हैं। देश को समझनें-जाननें के लिए उन्हें इस तरह के चुनाव काफी मददगार भी साबित होते हैं/हुऐं हैं।  उत्तराखण्ड एक पहाडी राज्य है, यहॉ की भौगोलिक परिस्थितियॉ अन्य राज्यों से सर्वथा भिन्न है, इसी भिन्नता के कारण यहॉ की सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक व सॉस्कृतिक परिस्थितियॉ भी भिन्न है, राज्य की मूल समस्याओं को जाननें-समझने के लिए जरूरी है की उसनें उसे भोगा हो या उससे पाला पडा हो ? पहाड में रह कर पहाड जैसा जीवन जिया हो ? सम्भवतः चुनाव लडनें की सबसे बडी योग्यता यही होंनी चाहिए थी ? आमतौर पर पढे-लिखे नौजवानों का रूझान पहले नौकरी, व्यवसाय अथवा अपनें को गॉव से बाहर शहर-कस्बों में अपनें आप को स्थापित करना होता है, समाज सेवा, राजनीति अथवा चुनावी राजनीति उनके लिए दूसरा या तीसरा विकल्प होता है, जिसे वे अनिच्छा से स्वीकार करते हैं, ऐसे में वे गॉव या क्षेत्र के विकास से पहले अपनें विकास को ज्यादा तवज्जो देंगें ? इसकी आशंका है, और यही से भ्रष्टाचार के जाल बुननें कव काम शुरू हो जाता है ?


    ग्रामीण क्षेत्रों में लडे जानें वाले इन चुनावों को लेकर सबसे बडी गफलत दो बच्चों की बाध्यता को लेकर है। आज से दस-बीस साल पहले अगर ये नियम नहीं था तो फिर उन उम्मीदवारों को इसकी सजा क्यों दी जानीं चाहिए ? विधि का प्राकृतिक नियम ये है की वह जब से लागू की जाती है तब ही से उसके प्रावधानों को कार्यान्वित किया जाता है।  अतः कहा जा सकता है की यह नियम प्रकृति के भी बिल्कुल भिन्न है। इससे पहाडी क्षेत्र की बडी जनसंख्या प्रभावित होगी या जैसे आशंका जताई जा रही है, की पंचायत राज चुनावों में 10 से 20 फीसदी तक पद रिक्त जा सकते हैं कहा तो ये भी जा रहा है की इन दो शर्तों के चलते प्रत्याशियों का मिलना ही मुश्किल हो जायेगा ?  जिससे इन क्षेत्रों के विकास कार्य स्वाभाविक रूप से प्रभावित होंगें ? ग्रामीण स्तर पर होंनें वाले इन चुनावों में कई लोग इसलिए चूक जायेंगें की वे एक शर्त पूरी करते, दूसरी शर्त पूरी न कर पानें के कारण चुनावी दंगल से बाहर रह जायेंगें, यानी उम्मीदवार पढाई-लिखाई में तो अव्वल है, परन्तु तीन संतान होंनें के कारण वह सीधे अयोग्य घोषित हो जायेगा ? जिसका खामियाजा आम जनता को भूगतना पडेगा ?  राज्य में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था लागू है, यानी 50,000 जनप्रतिनिधियों में 25,000 स्थान महिला प्रतिनिधियों के लिए लागू है, यह महिला सम्मान और सशक्तिकरण के लिए बहूत उपयोगी रहा, इसकी प्रसंशा की जानीं चाहिए, वीरा देवी, जानकी, अंजू और शकुन्तला देवी जैसी महिलाओं नें न केवल अपनें बूते चुनाव लडा बल्कि अगले पॉच सालों के लिए वार्ड सदस्य, प्रधान/उपप्रधान क्षेत्र प्रमुख व जिला पंचायत अध्यक्षी की भूमिका में भी अपनीं प्रशासनिक क्षमता का लोह भी मनवाया ? निश्चित रूप से पंचायत राज एक्ट की इस भूल का खामियाजा महिलाऔं को अपेक्षाकृत ज्यादा भुगतना पडेगा ? अब इस संशोधन से  महिलाऐं सीधे-सीधे बाहर हो जायेंगीं। क्योंकि  शिक्षा के मामले में ग्रामीण महिलाओं का प्रतिशत बेहद न्यून है, परम्परागत रूप से अल्पायू में ही वैवाहिक बंधन में बंध जानें व संतान वृद्वि से उन्हें ही इसका सबसे बडा  नुकसान होगा  ?


    गॉधी जी के ग्राम स्वराज की धारण के मुताबिक बनें इस पंचायत राज व्यवस्था का उद्देश्य सत्ता के विकेद्रीकरण के साथ-साथ आम लोंगों को उनके भाग्य के निर्माण के लिए उन्हें स्वतंत्रता प्रदान करना था। गॉधी जी का सपना था की एक गॉव को एक राज्य के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, गॉव के लोंगों की सारी जरूरतें गॉव मे रहकर ही पूरी की जानीं चाहिए, ऐसी व्यवस्था का निर्माण किया जाना चाहिए की हर हाथ को काम मिले । जिससे पलायन जैसी बडी समस्या (जिसका उत्तराखण्ड पीडित है,)का हल संभव है, इस प्रकार के कठोर मानकों से गरीब, दलित, महिला और असहाय चुनाव लडनें/लडानें से सीघे-सीधे महरूम हो जायेगा , फिर हम इसे लोकतंत्र नहीं बल्कि कुछ खास लोंगों का तंत्र कहलायेगा ।   


    इस पहाडी राज्य की सबसे बडी बिडंम्बना दो सियासी पार्टियों भाजपा और कॉग्रेस की नूर कुश्ती है, पिछले दो दशकों से बारी-बारी से सत्ता का सूख  भोगती रही इन पार्टियॉ नें पहाड की असल समस्या को समझनें का प्रयास ही नहीं किया, किसी भी राज्य की योजना/नीति को बिना समझे-बूझे राज्य के ऊपर थोप देंना, धरातल पर उसके परिणामों की अनदेखी करनें से राज्य की दिशा को गर्त में ले जानें का काम कर रहे हैं, अपनीं  अदूरदर्शी नीतियों के कारण ही इस पहाडी राज्य में घोर निराश का वातावरण है, एक भी योजना/नीति ऐसी नहीं जिससे यहॉ की संस्कृति, भौगोलिक स्थिति, सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था को पहचान कर विकास के लिए कोई ’रोडमैप’ तैयार किया हो ? अलबत्ता जब भी कोई पार्टी सत्ता में आता है वह ऐसे तुगलकी फरमान जारी कर देती है, जिसका राज्य की जमीन से को वास्ता ही नहीं होती है।  पंचायत राज एक्ट में संशोधन भी इसी की एक कडी है, आज कॉग्रेस पार्टी तिलमिलाई है, बहुत गुस्से में है, वह इसे बिना सोचे-समझे, जनविरोधी और घातक बता रही है।  लेकिन उसका यह ’विरोध’ प्रदर्शन भी महज  सॉकेतिक और प्रतीकात्मक ही है ? सम्भवतया उसे भी इस बात की सही-सही जानकारी नहीं है की इस संशोधन के धरातल पर दुष्परिणाम क्या हो सकते हैं ? इसीलिए कभी देहरादून के गॉधी पार्क तो कभी परेड ग्राउण्ड में कुछ देर एकत्र हो कर नारेबाजी तक सीमित रहकर, अपनीं जिम्मेदारी से पल्ला झाड देंना है ? उसे अच्छी तरह से पता है आगामी आनें वालेृ सरकार उसी की है, क्योंकि जनता बेचारी के पास कोई विकल्प भी तो नहीं है, ऊधर सत्ता की मौज ले रही भाजपा के लिए कोई जल्दीबाजी नहीं अगले चुनाव तक उसका कोई बाल का बॉका भी नहीं कर सकता है ?


    भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री केद्रीय कैबिनैट मंत्रीगणों के लिए अगर कोई शैक्षिक योग्यता अथवा पारिवारिक संरचना संबंधी कोई बाध्यता स्थापित नहीं की गई है, तो उसे संविधान निर्माताओं की दूरदर्शिता व बडी सोच का ही परिणाम  कहा जायेगा। आज देश जिस प्रगति, तरक्की के साथ आगे बढ रहा है, उसमें जनप्रतिनिधि की कोई शैक्षिक योग्यता और कोई और निर्धारित नहीं था ? जबकी गॉव-देहात की सरकार के लिए किसी प्रकार की योग्यता का निर्धारण करना सिवाय मुर्खता के कुछ नहीं है, यह निर्णय जन-आस्थाओं पर छोड देंना चाहिए, की वह किस तरह का प्रतिनिधि पसंद करते है ? यही सच्चा लोकतंत्र भी है। कई बार सरकारी और गैर सरकारी क्षेत्रों के उच्च पदस्थ अधिकारी (आइ0ए0एस0, आइ0पी0एस0 आइ0एफ0एस0) सेना के बडे अधिकारी रिटायर्ड होकर जब चुनाव लडनें जनता के बीच आते हैं, तो जनता उन्हें नकार देती है, क्योंकि जनता जानती है, की चुनाव जीतनें का आधार जन सेवा, आम जनमानस के दुःख-दर्द में शामिल होंना बडी बात है, नहीं की, बडी पदवी व बडी शिक्षा अथवा बडा ’नाम’ कोई चुनाव जीतनें का आधार बना है और न, बनना चाहिए ? एक नजीर के तौर पर जोशीमठ के मूल निवासी व कभी भाजपा के कद्दावर नेता, मंत्री रहे के पूत्र नें अपनीं पतिष्ठित सेवा से वी0आर0एस0 लेते हुए विधान सभा का चूनाव लडा और बूरी तरह हार गए, कारण यही रहा की जनतंत्र में जनता अपनें बीच के ही सूख-दुःख के साथी को ही अपना प्रतिनिधि स्वीकर करती है, न की किसी ’खास’ को ? राज्य और गॉव-देहातों के विकास व समृद्वि के लिए आवश्यक है, की आम जनता में घुले-मिले लोग चुनाव में प्रतिभाग करें, नेतृत्व करें अपनें  अनुभवों का लाभ आम जनमानस में बॉटे ? ऐसे लोग की कागजी शिक्षा/संतानोत्पत्ति/पारिवारिक संरचना सम्बन्घी  अथवा किसी बडे रोडे को अटकाये बिना वास्तविक धरातल उनके कामों/अनुभवों चरित्र व सामाजिक आचरण/व्यवहार को महत्व को बडी योग्यता मानते हुऐ,  जनता को अपनें प्रतिनिधि चूननें का आत्म निर्णय का अधिकार सौंपा जाय ?