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देहरादून : कर्म योग का अर्थ सभी बातों में बैलेंस रहना है। कर्म करते हुए योग को नही भूलना और योग करते हुए कर्म को नही भूलना ही कर्मयोग है। कर्म का त्याग नही करना है, बल्कि कर्म में त्याग करना है। योग का त्याग नही करना है बल्कि योग करते हुए कर्म करना है। प्रवृत्ति मार्ग और निवृत्ति मार्ग में संतुलन का नाम ही कर्मयोग है। कर्मयोग को मध्यम मार्ग भी कह सकते है। कर्मयोग सभी बातों में मध्यम मार्ग अपनाने पर बल देता है। कर्मयोग अध्यात्म और व्यवहार में बैलेंस रखने में बल देता है। अर्थात हमें अध्यात्म को व्यवहारिक बनाना है अथवा व्यवहार में अध्यात्म को लाना है।

                                        मनोज श्रीवास्तव

कर्म और योग में बैलेंस रखने के लिए प्रैक्टिस की जरूरत होती है। प्रैक्टिस के बाद हम कर्मयोगी के सम्पूर्ण स्टेज पर पहुॅच जाते है। इसलिए हमें अपने सम्मूर्ण स्टेज की परख होने पर हम किसी भी प्रकार के विघ्न का सामना कर सकते है। अपूर्ण स्टेज पर हम चलते चलते रूक जाते है। परन्तु राह का राही कभी रूकता नही है। ऐसे ही अपने को राही समझ कर चलते रहना है। सम्पूर्ण स्थिति की स्टेज के विशेष गुण से हम अपनी स्थिति को परख सकते है। हम जान सकते है कि हम अपने लक्ष्य के कितने समीप पहुॅचे है।

दोनो बातो में बैलेंस रखकर साक्षी पन की स्थिति में कमाल का अनुभव होता है। इससे हम अपने आप से सन्तुष्ट रहते है और हमसे सभी सन्तुष्ट रहते है। यदि बैलेंस न हो तब खिटपिट होता है,समय व्यर्थ जाता है और जो प्राप्त होना चाहिये वह नही हो पाता है। एक पावँ से चंलने वाला लँगड़ा कहलाता है। ऐसा व्यक्ति न तो हाई जम्प दे सकता है और न ही तेज दौड़ सकता है।

सम्पूर्ण स्टेज के प्रैक्टिल स्वरूप में सभी प्रकार के कर्मो में समानता आ जाती है। समान्ता अर्थात सभी बातों में बैलेंस होना है। निन्दा-स्तुति, जय-पराजय, सुख-दुख, सभी बातों में मध्यम मार्ग अपनाते हुए समानता लाना है। यदि इनमें परसेन्टेज होगा तब समानता में भी परसेन्टेज होगा। दुख में भी चेहरे और मस्तक पर दुख की लहर के बजाय हर्ष की लहर दिखाई दे।

निन्दा सुनते ही ऐस अनुभव हो कि यह निन्दा नही है बल्कि सम्पूर्ण स्टेज का परिपक्व करने वाले महिमयोग्य शब्द है। इस समानता में थोड़ा भी अन्तर नही आना चाहिए। यह दुश्मन है, गाली देने वाला है, हमारा महिमा करने वाला है, ऐसे वृत्ति ना हो सभी स्थितियों में शुभ चिन्तक दृष्टि में कल्याण का भाव हो।

स्नेह, प्रेम और शक्ति दोनो बातों में बैलेंस जरूरी है। बैलेंस सीखने के लिए नट के खेल को देखना होगा। बात तो साधारण होती है लेकिन कमाल का बैलेंस होता है। महिमा सुनते ही महिमा का नशा चढ जाता है और अपनी निन्दा, ग्लानि से घृणा हो जाता है। लेकिन ना तो महिमा का नशा हो और ना ही ग्लानि, निन्दा से घृणा हो।

शिवशक्तियों की परिकल्पना में भी शिव और शक्ति दोनों गुणों में बैलेंस का चित्र दिखता है। इसलिए अपने में जो कमी है उसे पूरा करके सम्पन्न बनना चाहिए और अपने कार्य में जिस प्रकार का प्रभाव निकालना चाहते है उस प्रकार की सफलता लेनी चाहिए।

अभी तक की स्थिति में बैलेंस की कमी दिखती है। एक बात का प्रभाव होता है तब दूसरी बात में कम निकलता है। एक बात का तो वर्णन कर देते है लेकिन सभी बातों के वर्णन में असफल हो जाते है। सभी बातों अर्थात धर्म और कर्म में बैलेंस रखना होता है। लेकिन आज कल लोग दोनो को अलग-अलग करके देखते है। कर्म करते हुए धर्म को भूल जाते है और धर्म में रहते हुए कर्म को भूल जाते है। इस कमी के कारण आज की भयानक परिस्थितियां बनने लगी है।

तराजू जब दोनो तरफ चलता है तभी तराजू का मूल्य होता है। तराजू का अर्थ हमारी बुद्वि है। हमारी बुद्वि में सभी बातों का बैलेंस होगा तभी हम श्रेष्ठ, बुद्विमान, दिव्यबुद्वि वाले कहलायेगे अन्यथा साधारण बुद्वि कहलायेगें। हमें साधारणता में समानता नही लानी है बल्कि श्रेष्ठता में समानता लानी है। ऐसा व्यक्ति ही कर्म योगी कहलता है।

एकान्तवासी भी रहे और रमणीकता बनी रहे। दोनो शब्दों में दिन रात का अन्तर है लेकिन समपूर्णता के लिए दोनो में समानता लाना जरूरी है। एकान्तवासी भी इतना बनना है कि रमणीकता बनी रहे और रमणीकता भी ऐसे हो कि एकान्तवासी का अनुभव न भूले। क्योकि अति रमणीकता में आ जाते है तब कहते है कि हम अन्तरमुखता की स्टेज से नीचे की अवस्था में चले जाते है।

जितना हम गंभीर हो उतना ही मिलनसार भी हो, ऐसा नही है कि हम केवल गंभीर मूर्त बने रहे। मिलनसार बनना अर्थात सभी के संस्कार और स्वभाव से मिलन करना है। गंभीरता का अर्थ यह नही है कि हम किसी से मिलने से ही दूर हो जाय। अति किसी बात की अच्छी नही हाती। कोई बात अति में आती है तब उसे तूफान कहते है।

हमें ऐसे पावरफुल स्थिति बनानी है कि हम जैसा चाहे वैसा कर सके और जहाँ चाहे अपने को टिका सके और अपनी इच्छानुसार बुद्वि के पाॅव अडिग रखे। बैलेंस ठीक न रहने के कारण हम हिलते डुलते रहते है और कभी-कभी गिर पडते है। यदि बुद्वि की हलचल होती है तब समानता नही हो सकती है। इसी कारण बुद्वि में व्यर्थ संकल्पों का हलचल मचता है।

यदि कोई वस्तु हमें आकर्षित करती है अर्थात समपूर्णता की कमी है। जितनी कमी होगी उतना ही हम लोगों को कम आकर्षित कर पायेंगे लेकिन समपूर्णता की स्टेज पर लोग न चाहते हुए भी हम से आकर्षित होंगे। क्योकि समपूर्णता के प्रभाव की अपनी शक्ति होती है।

यदि बैलेंस ठीक न रहे तब हम हिलने डुलने लगते है। लेकिन इसे खेल के समान साक्षी स्वरूप में देखने पर, स्वयं पर हंसी आ जाती है। जब हम पूरी तरह होश में न रहे तब स्वयं अपनी चाल चलन देखने पर हमें हंसी आ जाती है। क्योकि माया थोडी देर के लिए हमें बेहोश कर देती है और हमारे श्रेष्ठ स्मृति का होश गायब हो जाता है। इसका असर हमारे चाल चलन पर पडता है। जब जानते है, मानते है और वर्णन भी करते है जब चलते क्यो नही है। जानकर, मानकर और वर्णन करने के बाद चलना होता है। इसे ही कर्म और योग की समानता अथवा मध्यम मार्ग कहते है।

अव्यक्त महावाक्य बाप दादा मुरली 08 जून, 1972.

लेखक : मनोज श्रीवास्तव, सहायक निदेशक सूचना एवं लोकसम्पर्क विभाग उत्तराखंड देहरादून

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