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    वर्षाकाल में फल पौधों का रोपण कैसे करें

    10-07-2019 16:58:13

    देहरादून (डॉ. राजेन्द्र कुकसाल):  बरसात के मौसम में मुख्यत: आम, अमरूद, अनार, आंवला, लीची, कटहल,अंगूर तथा नीम्बू वर्गीय फल पौधों का रोपण किया जाता है। उद्यान लगाने से पहले कुछ बातों को ध्यान में रखा जाना आवश्यक हैं।

    स्थल का चुनाव
    1.वर्षाकालीन फलदार पौधों के बगीचे समुद्रतल से 1500 मी॰ ऊचाई तक लगाये जा सकते हैं ढाल का भी ध्यान रखें पूर्व व उत्तरी ढाल वाले स्थान पश्चमी व दक्षिणी ठाल वाले स्थानौ से ज्यादा ठंडे होते हैं जो क्षेत्र हिमालय के पास हैं वहां पर आम, अमरूद, लीची के पौधों का रोपण व्यवसायिक दृष्टि से लाभकर नहीं रहते हैं, ऐसे स्थानों पर नींबू वर्गीय फलदार पौधों से उद्यान लगाने चाहिए।
    2- उद्यान लगाने से पूर्व यह भी ध्यान रखना चाहिए कि जिस फल की ज्यादा मांग हो उसी फल के उद्यान लगाये जायें।
    3- उद्यान सडक के पास होना चाहिये यदि यह सम्भव न हो तो यह आवश्यक है कि उद्यान में पहुंचने के लिए रास्ता सुगम हो ताकि फलों का ढुलान सुगमता से किया जा सके।
    4- सिंचाई की उपयुक्त व्यवस्था हो।
    5- कार्य हेतु मजदूर आसानी से उपलब्ध होते हों।
    6-उद्यान की सुरक्षा हेतु घेर बाड़ की उचित व्यवस्था हो।

    भूमि का चुनाव एवं मृदा परीक्षण
    फलदार पौधे पथरीली भूमि को छोड़कर सभी प्रकार की भूमि में पैदा किये जा सकते हैं। परन्तु जीवाँशयुक्त बलुई दोमट भूमि जिसमें जल निकास की व्यवस्था हो सर्वोत्तम रहती है ।
    जिस भूमि में उद्यान लगाना है उस भूमि का मृदा परीक्षण अवश्य कराएं जिससे मृदा का पीएच मान (पावर औफ हाइड्रोजन या पोटेंशियल हाइड्रोजन ) व चयनित भूमि में उपलव्ध पोषक तत्वों की जानकारी मिल सके। पीएच मान मिट्टी की अम्लीयता व क्षारीयता का एक पैमाना है यह पौधों की पोषक तत्वों की उपलब्धता को प्रभावित करता है यदि मिट्टी का पीएच मान कम  (अम्लीय)है तो मिट्टी में चूना या लकड़ी की राख मिलायें यदि  मिट्टी का पीएच मान अधिक (क्षारीय)है तो मिट्टी में कैल्सियम सल्फेट,(जिप्सम) या यूरिया उर्वरक का प्रयोग करें। भूमि के क्षारीय व अम्लीय होने से मृदा में पाये जाने वाले लाभ दायक जीवाणुओं की क्रियाशीलता कम हो जाती है साथ ही हानीकारक जीवाणुओ /फंगस में बढ़ोतरी होती है साथ ही मृदा में उपस्थित सूक्ष्म व मुख्य तत्त्वों की घुलनशीलता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। अधिकतर फल पौधों के लिए 5.5 - 7.5 के पीएच की भूमि उपयुक्त रहती है। पेड़ पौधों को 9 मुख्य एवं 7 सूक्ष्म कुल 16 पोषक तत्त्वों की आवश्यकता होती है जिसमें से कार्बन, हाइड्रोजन व औक्सीजन पौधे पानी व हवा से लेते हैं तथा अन्य पोषक तत्व मिट्टी से जिनका उचित मात्रा में मिट्टी में उपलब्ध होना आवश्यक है। क्षारीय व कम उपजाऊ वाली भूमि में अमरूद तथा आंवले के पौधे लगाये जा सकते हैं।

     जातियों का चुनाव-
    उद्यान की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि अधिक एवं अच्छे गुणवता वाले फल देने वाली
    किस्मों का चयन किया जाये। मुख्य फलों की सर्वोतम जातियाँ निम्न हैं-
    (अ)     आम- बाम्बे ग्रीन, बाम्बे यलो दशहरी, लंगडा, चौसा।
    बौनी-आम्रपाली ,मल्लिका।

    पहाड़ी क्षेत्रों में लगने वाले आम के पौधौ की आपूर्ति मैदानी क्षेत्रों की पौधालयौं से ही होती है जिस कारण याता यात में किसान के खेत तक पहुंचने में ज्यादातर पौधों की पिन्डियां टूट जाती हैं टूटी पिन्डी के पौधे लगाने पर इनमें मृत्यु दर बहुत अधिक होती हैं दूसरा ज्यादा आर्थिक लाभ के चक्कर में पौध आपूर्तिकर्ताओं द्वारा एक ही बर्ष के पौधे जिनकी मुख्य जड़ कटी हुई होती है की आपूर्ति योजनाओं में कृषकों को वितरित कर दिए जाते हैं कहने का अभिप्राय यह है कि मैदानी क्षेत्रों से आपूर्ति किए गए आम के पौधे पहाड़ी क्षेत्रों में नहीं चल पाते। कृषकों को यथा स्थान ग्राफ्टिंग (In situ) विधि से इन क्षेत्रों में आम के बाग विकसित करने चाहिए।
    (ब) अमरूद    - लखनऊ 49, इलाहाबादी सफेदा।
    (स)    लीची    - कलकतिया, रोजसेन्टेड,वेदाना।
    (द) अनार- गणेश,ढोलका ,वेदाना।
    (य)  आंवला- हाथी झूल,चकय्या,एन-7,एन-6.कृष्णा, कंचन।
    (र)    अंगूर    - परलैट, हिमराड, पूसा सीडलेस।
    (ल) कटहल - कटहल के पौधे व्यवहारिक रूप से बीज द्वारा ही तैयार किए जाते हैं रंग व आकार में अच्छे पके कटहल के फलौं से बीज निकालकर 15 दिनौ के अन्दर ही पौलीथीन की थैलियों में बो देना चाहिए नहीं तो बीजों की अंकुरण क्षमता में कमी आ जाती है।बोने के लिए बड़े आकार के बीजों का चुनाव करें। पौलीथीन बैग में तैयार पौधों को उचित स्थान पर लगायें। बीजों को सीधे पौध रोपण हेतु तैयार गड्डौं में भी बोया जा सकता है यदि बीज सीधे तैयार गड्डौं में बोना है तो एक गड्डे में 2-3 बीज बोए एक से अधिक बीज जमने पर इन पौधों को अन्य जगह पर लगायें एक गड्डे में एक ही पौधा रखें।
    (स) नीम्बूवर्गीय फल पौध-
    1- मीठा संतरा    - मौसमी, माल्टा कामन, जाफा ,ब्लडरेड।
    2- मेन्डरिन संतरा - श्रीनगर संतरा, हिल ओरेन्ज, किन्नो।
    3-नींबू - कागजी, कागजी कलां, पन्त लेमन, पहाड़ी नींबू।

    नीम्बू वर्गीय फल उद्यान हेतु न्यूसेलर सीडलिंग के पौधो का रोपण करें
    पर्वतीय क्षेत्रों में भूमि की कम गहराई, पानी का अभाव आदि कारणौ से नीम्बू बर्गीय कलमी पौधे नहीं चल पाते हैं इस कारण न्यूसेलर सीडलिंग पौधों का ही रोपण करें।
    अधिकांश सिट्रस प्रजातियों बहु भ्रूणीय होती है जिनमें एक बीज से 2-3 या अधिक भ्रूण (पौधे) निकलते हैं इनमें केवल एक ही लैंगिक (zygotic)भ्रूण होता है जो काफी कमजोर होता है इसे आसानी से पहिचान कर न्यूसेलर बीजू पौधों से अलग किया जा सकता है बाकी सभी दूसरे भ्रूण जो कि लैंगिक की अपेक्षा स्वस्थ होते हैं न्यूसेलस की कोशिकाओं से बनते हैं जिन्हें न्यूसेलर भ्रूण (पौधा) कहा जाता है । न्यूसेलर सीडलिंग आनुवांशिक  रूप से मातृ वृक्ष के समान होते हैं इन में वायरस व अन्य रोगौ का प्रकोप कम पाया जाता है।
    सिट्रस के बीजों में कोई सुशुप्तावस्था नहीं होती तथा इन्है ताजा ही बोया जाता है। पौलीथीन बैग में न्यूसेलर पौध तैयार कर बाद में उचित स्थान पर लगायें।माल्टा की अपेक्षा संतरा/नारंगी के अधिक पौधे लगायें नारंगी की मांग बाजार में अधिक रहती है।

     रेखांकन तथा गढ्ढों की खुदाई -
    पौधों के सही विकास व अधिक फलत तथा अच्छे गुणों वाले फल प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि पौधों को निश्चित दूरी पर लगाया जाय। विभिन्न फलदार पौधों के लिए लाइन से लाइन तथा पौधों से पौध दूरी निम्नुनानुसार रखनी चाहिए।
    1-आम, कटहल, आंवला 10 x 10 मी॰
    2- लीची, बेर 8 x 8 मी॰
    3- अमरूद, नींबू वर्गीय फल 6 x 6 मी॰
    4- अंगूर - 3 x 3 मी॰

     पौध लगाने से पूर्व रेखांकन (वर्गाकार,आयता कार) बनाकर 1x1x1 मी॰ आकार के गढ्ढे गर्मियों में खोदकर 15 से 20 दिनों के लिए खुला छोड देना चाहिए ताकि सूर्य की तेज गर्मी से कीडे़ मकोड़े मर जाय। गड्डा खोदते समय पहले ऊपर की 6"तक की मिट्टी खोद कर अलग रख लेते हैं इस मिट्टी में जींवास अधिक मात्रा में होता है गड्डे भरते समय इस मिट्टी को पूरे गड्डे की मिट्टी के साथ मिला देते हैं इसके पश्चात एक भाग अच्छी सडी गोबर की खाद या कम्पोस्ट जिसमें ट्रायकोडर्मा मिला हुआ हो को भी मिट्टी में मिलाकर गढ्ढों को जमीन की सतह से लगभग 20 से 25 से॰मी॰ ऊंचाई तक भर देना चाहिए ताकि पौध लगाने से पूर्व गढ्ढों की मिट्टी ठीक से बैठ कर जमीन की सतह तक आ जाये।

     पौधों का चुनाव- पौधे क्रय करते समय निम्न बातों को ध्यान में रखना चाहिए।
    1- सही जाति के पौधे हों।
    2- पौधें स्वस्थ एवं मजबूत हों।
    3- कलम का जुड़ाव ठीक हो।
    4- पौधों की वृद्वि एवं फैलाव मध्यम श्रेणी का हों।
    5- चश्मा (कलम) मूलवृंत पर 15 से 20 से॰मी॰ उँचाई पर लगा हों।
    6- पौधों की उम्र 1 वर्ष से कम तथा 2 वर्ष से अधिक ना हो।
    7- पौधों की पिण्डी सुडौल हो तथा मुख्य जड़ न कटी हो।
    पौध विश्वसनीय स्थान जैसे राजकीय संस्था, कृषि विश्वविद्यालय अथवा पंजीकृत पौधालयों से ही क्रय किया जाय।

    पौध लगाने का समय तथा विधि-
    वर्षाकालीन फल पौधों के लगाने का उपयुक्त समय मानसून की वर्षा शुरू होने पर करना उचित रहता है अर्थात माह जुलाई तथा अगस्त में पौधों का रोपण करना चाहिए पौधे लगाते समय निम्न बातों पर ध्यान देना चाहिए।
    1- पौधों को गढ्ढे के मध्य में लगाना चाहिए।
    2- पौधों को एकदम सीधा लगाना चाहिए।
    3- पौधों को मिट्टी में इतना दबाया जाय जितना पौधालय में दबा है।
    4- यह भी ध्यान रखा जाय कि किसी भी दशा में पौधों की कलम के जोड़ वाला भाग मिट्टी से ना ढकने पायें।
    5- पौध लगाने के बाद मिट्टी की पिण्डी के चारों ओर से अच्छी तरह से दबाना चाहिए ध्यान रहे पौधे की पिन्डी न टूटने पाय तत्पश्चात किसी सीधी लकड़ी से पौधों को सहारा देना चाहिए।
    6-लीची का नया बाग लगाने हेतु गड्ढ़ों को भरते समय जो मिट्टी व खाद आदि का मिश्रण बनाया जाता है उसमे पुराने  लीची के बाग़ कि मिट्टी अवश्य मिला देना चाहिए क्योंकि लीची कि जड़ों में एक प्रकार की सहजीवी कवक जिसे माइकोराइजा कहते है पाई जाती है । यह कवक   पौधों की जड़ों में रहता है तथा पौधों को फोसफोरस बोरोन व जिंक पोषक तत्व भूमि से उपलब्ध कराने है जिससे पौधे अच्छी प्रकार - फलते फूलते हैऔर नए पौधे में भी कवक अथवा लीची के बाग़ कि मिट्टी मिलाने से मृत्युदर कम हो जाती है ।

    बाद की देखभाल
    1- पौधे लगाने के तुरन्त बाद सिंचाई कर देनी चाहिए। यदि वर्षा न हो तो आवश्यकतानुसार पौधे की सिंचाई करते रहना चाहिए।
    2- पौधे के मूलवृतों से निकले कल्लों को समय-समय पर तोड़ते रहना चाहिए।
    नीम्बू वर्गीय पौधों में अनियमित तथा दोष पूर्ण कांट छांट के कारण एका एक पौधौं के मध्य से कोमल ,हरे चपटे , चौड़ी पत्ती के तथा अति शीघ्र बढ़ने वाली शाखाएं निकलती है जिन्हें जल प्रारोह(water shoots) कहते को शीघ्र निकाल देना चाहिए।
    3- जहां पर पानी की कमी हो तो नमी सुरक्षित रखने के लिए सूखी घास या पत्तियों से थापलों में अवरोध परत लगा देनी चाहिए।
    4-शुरू के बर्षौ में पौधों को ठंड/पाला से बचाव के उपाय करने चाहिए।