सामाजिक रूपांतरण हेतू मीडिया सशक्तिकरण, मीडिया व्यवसाय में एक नया आयाम आध्यात्मिकता - मनोज श्रीवास्तव

Publish 18-06-2019 20:16:56


सामाजिक  रूपांतरण हेतू मीडिया सशक्तिकरण, मीडिया व्यवसाय में एक नया आयाम आध्यात्मिकता - मनोज श्रीवास्तव

देहरादून : मीडिया कार्मिकों को सबसे पहले अपने आन्तरिक बदलाव पर फोकस करना होगा। उन्हें आत्मविश्वास और मन की ताकत के विकास पर बल देना होगा। यह कार्य आध्यात्म के अलावा अन्य किसी माध्यम से नही किया जा सकता है। स्वः परिवर्तन से विश्व परिवर्तन रूपान्तरण के लिए सबसे पहले अपने स्वः में  परिवर्तन लाना आवश्यक है। कथा सम्राट मुंशी प्रेमचन्द्र के अनुसार साहित्य/पत्रकारिता एक मसाल है जो समाज के आगे-आगे चलता है। स्वः में परिवर्तन का अर्थ है, स्वयं को जानना, अपने स्वरूप को जानना होता है। इस रूपान्तरण की धूरी आध्यात्मिकता है। आध्यात्म का कार्य अपने को जानना, सत्य को जानना और सत्य के आधार पर आगे बढ़ना है। इसे सत्याग्रह भी कह सकते हैं अर्थात सत्य के प्रति आग्रह रखना। स्वः परिवर्तन के लिए आत्मा का अध्ययन, स्वयं को अध्ययन और स्वयं को जानना पहचाना होता है। कहा जाता है शान्ति अभी नहीं तो कभी नहीं है। जो व्यक्ति जीते जी शान्ति प्राप्त नही कर सका वह मरने के बाद क्या शान्ति प्राप्त करेगा?
आज मीडिया अपने निष्पक्षता और सकारात्मकता को लेकर कठघरे में खड़ी है। इसके लिए हमें चिन्ता करने की नहीं बल्कि चिन्तन करने की आवश्यकता है। बाहृ चीजों को छोड़ते जाना और अपने अन्दर की यात्रा पर निकल जाने का इतिहास आध्यात्मिकता कहलाता है। इसके लिए शान्त, सजग एवं सचेत मन की आवश्यकता होती है। इसका केन्द्र बिन्दु हमारा मन है। हमें देखना होगा कि हमने अपने मन को नौकर बना दिया अथवा हम स्वयं अपने मन का नौकर बन गये हैं। मुद्दा यह नहीं है कि इसे हल कौन करेगा बल्कि मुद्दा यह है कि इसकी पहल कौन करेगा। हमें यह देखना होगा जब वे लोग अपना आतंकवाद और नश्लवाद नहीं छोड़ रहे हैं तब हम अपना हितवाद कैसे छोड़ दें। वास्तव में मीडिया की ताकत को सही दिशा देना होगा। वास्तविक रूप में मीडिया को ताकत देना होगा। इसके लिए मुख और मन में समन्वय करना होगा। टोल-गेट और पार्किंग में भुगतान करना होगा। मुफ्तखोरी की संस्कृति से बचना होगा। आधी परेशानी तभी समाप्त हो जाती है जब हम सकारात्मक सोचना प्रारम्भ कर देते हैं लेकिन पूरी परेशानी तभी समाप्त होगी। जब हम आध्यात्मिक सोच रखेंगे। आध्यात्मिक शक्ति हमें गाइड करती है जो हमें अच्छे कार्य के लिए प्रेरित करती है। सोल पावर में वाईटल एनेर्जी आत्म चिन्तन ही जीवन की वास्तविकता है।
मीडिया में हमें चुनाव करना पड़ता है। इसलिए हम पूरी तरह नियंत्रित रहें ताकि सही चुनाव कर सकें कि हमें कौन सा समाचार देना है कौन सा नहीं। समाचार देने के पूर्व एक बार जरूर सोचें की मैं क्या परोसने जा रहा हूँ। हमें अपने भीतर स्वयं रोल एवं रिस्पान्सबिलिटी लेनी होगी। हमें यह भी देखना होगा कि हम समाधान दे रहे हैं अथवा समस्या को बढा रहे हैं। गांधी जी ने अपने पत्रकारिता में आध्यात्मिकता का समावेश किया और मूल्यों का प्रयोग किया। आध्यात्मिकता एक मार्ग है जो सर्वोच्च शक्ति और गुणों की खोज को प्रेरित करती है। मूल्य आधारित पत्रकारिता आज के जीवन की आवश्यकता है। पत्रकारिता में मूल्यों की स्थापना आध्यात्म के बिना सम्भव नहीं है। इस क्षेत्र में अनेक समाचार पत्रों ने पहल भी किया है। भाष्कर समाचार पत्र सोमवार को कोई भी नकारात्मक समाचार प्रकाशित नहीं करता है। इसी प्रकार महाराष्ट्र के देशोन्नति  दैनिक समाचार पत्र ने पिछले तीन वर्ष से किसी भी क्राईम स्टोरी को मुख्य पृष्ठ पर स्थान नहीं दिया है।
मीडिया कार्मिकों को अपने बिलिफ सिस्टम, जीवन आधारित मूल्य में बदलाव लाना होगा। जैसे देर से उठना, देर से सोना जैसे आदतों में बदलाव लाना होगा। इसके लिए प्रयास यह करना होगा कि जब भी उठा जाए उससे ठीक आधे घण्टे पूर्व उठने का प्रयास किया जाए। धीरे-धीरे इस घण्टे को बढ़ाया जाए। सुबह-सुबह सकारात्मक विचार पर बल दिया जाए। क्योंकि सुबह-सुबह पैदा की गई विचार का प्रभाव हमारे ऊपर दिन भर रहता है। अपने अन्दर सकारात्मक सोचने की कला को विकसित करना होगा। मन को ट्रेनिंग देना होगा। ऐसा कहना गलत है कि समाज में नकारात्मक समाचारों की ही मांग है। वास्तविकता है आज लोग नकारात्मकता से ऊब कर सकारात्मक समाचारों की मांग करने लगे हैं। पत्रकारिता को मूल उद्देश्य सत्य को उद्घाटन करना है और समाज को सत्य की दिशा की ओर ले जाना है। यह सर्व विदित है कि सत्य सकारात्मकता में ही निहित है।
पिछले वर्षों में धार्मिक चैनलों की संख्या बढ़ती जा रही है। मीडिया को यह देखना होगा कि वह धार्मिक कट्टरता और अन्धविश्वास को बढ़ावा तो नहीं दे रही है। धर्म और आध्यात्म में अन्तर है। आध्यात्मिकता शाश्वत मूल्य पर आधारित है परन्तु धर्म में कोई जरूरी नहीं है कि शाश्वत मूल्य को महत्व दिया जाए।  धर्म अपनी मूल तत्व से भटक कर अन्ध विश्वास और कट्टरता को बढ़ावा दे रहा है। आध्यात्मिकता के मूल तत्व शान्ति, प्रेम, शक्ति, ज्ञान, पवित्रता, सुख और आनन्द हैं, परन्तु यह मूल तत्व हमारे धर्म ही नहीं बल्कि जीवन एवं व्यवसाय से भी गायब हो चुके हैं। इसके दुष्प्रभाव के  हमारा मस्तिष्क को अपराधीकरण जातिवाद और सम्प्रदाय वाद से प्रभावित हो रहा है। नारद, संजय एवं स्वतंत्रता पूर्व मीडिया व्यापार से प्रभावित नहीं था, परन्तु आज की मीडिया व्यापार से प्रभावित होकर अपने कर्तव्य से भी दूर हो गई है। कहा जाता है जो सूर्य को नहीं दिखता है वह एक कवि देख लेता है, परन्तु जो कवि को भी नहीं दिखाई देता वह सारी गलतियाँ मीडिया देख लेता है। मीडिया में कार्य करते समय हमें देखना होगा कि हम अपने स्वतंत्रता का उपयोग अथवा दुरूपयोग कैसे करते हैं। इसके लिए स्वः अनुशासन एवं स्वः नियंत्रण की आवश्यकता है। हमारा दायित्व केवल समाचार देना ही नहीं है बल्कि संस्कार एवं विचार भी देना है। यह कार्य काई मीडिया ही कर सकता है।
सोशल मीडिया के बारे में कहा जाता है बन्दर के हाथ में उस्तरा दे दिया गया है। बन्दर के हाथ में बन्दूक देना खतरनाक है। इसके दुष्प्रभाव से कई प्रकार के गलत मान्यताओं का दुष्प्रचार हो रहा है। सोशल मीडिया का प्रयोग हमें कैसे करना है इस विषय में हमें सजग एवं सचेत रहना होगा। यदि हम लापरवाह रहते हैं तब सोशल मीडिया सौ झूठ को एक सच में बदलने की क्षमता रखता है। प्रश्न है कि सोशल मीडिया में शिक्षण-प्रशिक्षण कौन करेगा? क्या इसका दायित्व व्हाट्अप फेसबुक और अनपढ़ लोगों को देना उचित है? सोशल मीडिया में  सम्पादकीय जैसे फिल्टर प्रणाली की व्यवस्था नहीं है। सोशल मीडिया का मूल दर्शन व्यवसायिक है।  जब हमारे जीवन का मूल्य व्यवसाय हो जाए तब मीडिया के बाजारीकरण को कोई रोक नहीं सकता है। सोशल मीडिया में व्यवसायिक एवं राजनीतिक हितों को देख कर मूल कंटेंड में छेड-छाड की जा रही है। सोशल मीडिया के नियंत्रण के लिए शिक्षित एवं प्रबुद्ध वर्ग को आगे आना होगा। अपनी रूल रिस्पांसबिलिटी के अनुसार काम करना होगा।  इसके लिए हमारे अन्दर मन की ताकत का होना अनिवार्य है। मन की ताकत मिलने पर हम देश के लिए खड़ा होते हैं, इसके बाद हमें न वेतन की चिन्ता होती है न व्यवसाय की चिन्ता होती है। मन की ताकत हमे समष्टि भाव से जोड़ता है। सोशल मीडिया के गैर जिम्मेदार होने पर प्रिन्ट एवं इलेक्ट्राॅनिक मीडिया की जिम्मेदारी अधिक बढ़ जाती है। नकारात्मक सोशल मीडिया के प्रति सकारात्मक सोशल मीडिया के भी प्रयास हो रहे हैं। वायरल सच की पड़ताल एक गम्भीर प्रयास है इस प्रया को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
आज मीडिया अच्छा कार्य कर रहा है। मीडिया लोगों को लोगों से मिलाता है, अपना जान जोखिम में डालकर दुर्घटना स्थल पर पहुचता और इसे कवर करता है। मीडिया कर्मी आतंकवाद और तूफान को भी कवर करता है। कहा जाता है जिसका कोई नहीं होता उसका मीडिया होता। सफेद वस्त्र पर एक काला धब्बा भी बड़ा दिखाई देता है। मीडिया से लोगों को बहुत अधिक उम्मीदें हैं। अजीत डोभाल और खैरनार केवल अपने वेतन और कैरियर के लिए नहीं कार्य करते हैं। बहुत से लोग अपने नौकरी अपने जीवन के नियमों और सिद्धान्तों के आधार पर करते हैं। मीडिया कर्मी को शिकायत करने की जगह यह बात विशेष ध्यान देना होगा कि यह व्यवसाय स्वयं उनके द्वारा ही चुना गया है। इसलिए मीडिया सम्बन्धी व्यवसाय में खतरों की बात करना गलत है। कहा जाता है कि पत्रकार सभी वर्गों की माँ है, जो अपने हित वेतन की मांग नहीं कर पाता है।
सामाजिक संवेदन के कारण ही कोई व्यक्ति पत्रकारिता को व्यवसाय बनाता है। इसलिए दूसरे वर्गों के समान इसके सुख-दुख की तुलना नहीं की जा सकती है। मीडिया कर्मी को दूसरों के प्रति जवाबदेही को देखकर अपना कार्य करना होगा। मीडिया में आध्यात्म एवं मूल्य का समावेश सकारात्मक सामाजिक रूपान्तरण के लिए जरूरी है।  नियम, कानून और नीति  Ethics, Low, Rule  ऐसे उपकरण हैं, जो बाहृय परिवर्तन में सहायक हैं। जबकि आध्यात्मिकता एवं शाश्वत मूल्य हमें भीतर से परिवर्तित करने में हमें मद्द करती है, क्योंकि यह हमारे अस्त्वि से जुड़ी होती है। आध्यात्मिकता अपने अन्दर देखने एवं बदलाव की शक्ति प्रदान करती है। इससे प्राप्त शक्ति से हम अपनी सीमित क्षमताओं से बाहर जाकर भी  लोगों की मद्द करने के लिए प्रेरणा प्राप्त करते हैं। बुराई ही नहीं अच्छाई भी संक्रामक के रूप में कार्य करती है। इसमें स्वः प्रेरणा का भाव होता है। एक व्यक्ति यदि तीन व्यक्तियों को प्रेरित करे फिर धीरे-धीरे यह अच्छाई संक्रमण के रूप में सम्पूर्ण विश्व को परिवर्तित कर देगी। मीडिया में यह शक्ति प्रयाप्त मात्रा में मौजूद है। बुराई को समाप्त करने के उद्देश्य से बुराई को प्रकाशित करना उचित नहीं होता है। यह कहना गलत होता है कि मीडिया समाज का दर्पण है। कोई बुरी घटना एक व्यक्ति के जीवन में घटता है और इसका प्रभाव कुछ लोगों तक सीमित होता है। परन्तु यदि मीडिया इस बुरी घटना को सामने लाता है तब यह घटना अनेक के जीवन को प्रभावित करेगी। मीडिया को अपने विचारों में मूल्यों को प्रदर्शित करना चाहिए क्योंकि यह हमारे सोच और सामाजिक रूपान्तरण में सकारात्मक भूमिका अदा करती है।


(उपरोक्त आलेख, प्रजापिता ब्रह्मकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के मीडिया प्रभाग द्वारा “मीडिया,आध्यात्मिकता एवं सामजिक रूपांतरण” के नेशनल मीडिया कान्फ्रेंस के निष्कार्ष पर आधारित है। यह 12 से 15 जून 2019 तक आयोजित नेशनल मीडिया कान्फ्रेंस, माउंट आबू स्थित ज्ञान सरोवर एकेडमी परिसर में सपन्न हुआ । इस महासम्मलेन में प्रिंट,इलेक्ट्रानिक,साईबर एवं प्रमोशनल मीडिया क्षेत्र से जुड़े लगभग 300 पत्रकार,वरिष्ठ पत्रकार, मीडिया प्रोफेशनल तथा एकेडमीशियनस ने सक्रिय रूप से भाग लिया ।)

लेखक

मनोज कुमार श्रीवास्तव
सहायक निदेशक, सूचना
प्रभारी मीडिया सेन्टर विधान सभा
देहरादून उत्तराखण्ड।

 

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