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देहरादून : जिस प्रकार योद्वा, युद्व भूमि पर जाने के पूर्व अपने शस्त्र और सामाग्री की जाॅच करने के बाद मैदान में जाता है, उसी प्रकार हम भी अपने कर्म भूमि के मैदान पर जाने के पूर्व अपनी शाक्तियो की जाॅच कर लें। हमें कर्म भूमि पर कर्मयोद्वा बनकर परिस्थितियों से युद्व करना है। कर्म करने के पूर्व अपने शस्त्र और शिव शाक्तियाॅ को लेकर कर्म करना है। कर्म क्षेत्र पर कर्मयोगी बनकर कर्म करने पर हम महारथी कहलाते है।

                                  मनोज श्रीवास्तव

कर्म भूमि के महारथी सोते समय भी शस्त्र और शाक्तियों का साथ नही छोडते है, क्योकि महारथी ऐसा नही समझते है कि जब परिस्थितियों का वार होगा तब हम शस्त्र के बारे में सोचेंगे। सोचते-सोचते लोगों का समय व्यतीत हो जाता है। इसलिए सदैव एल्र्ट और एवरेडी रहना है, क्योकि धोखे की रिजल्ट दुख की लहर पैदा करती है। अपनी कमी ही कमी को लाता है। यदि अपनी कमी नही है तब कोई कमी नही आ सकती है।

अपने को शिव शक्तियां समझ कर कर्म करना है। शिव और शाक्तियां दोनो साथ रहने पर हार का सामना नही करना पडेगा। जैसे आत्मा और शरीर का सम्बन्ध है, उसी प्रकार शिव और शक्ति का सम्बन्ध है। शिव और शक्ति का साथ ऐसा हो कि इसे कोई तोड ना सके और मिटा ना सके। ऐसा अनुभव करते हुए सदा शिव शक्ति स्वरूप में स्थित होकर रहे तब हमारे लगन में कोई विघ्न नही आ सकता है।

शिव शक्ति के आगे कोई दूसरी शक्ति वार नही कर सकती है या हार नही खिला सकती है। यदि हार होती है या माया का वार होता है तब इसका अर्थ है कि हम अपने शिव शक्ति स्वरूप में स्थित नही थे। शिव शक्ति की धरणा करते हुए दो बातो का अनुभव होता है, एक है साक्षीपन और दुसरा है साथीपन। साक्षीपन की स्टेज बिन्दु स्वरूप की स्टेज है अर्थात अव्यक्त स्थिति का अनुभव है।

साक्षीपन और दुसरा है साथीपन की स्टेज पर ऐसा अनुभव करेंगे कि कोई हमारे साथ साकार रूप में खडा है फिर कभी भी अपने में अकेलापन और कमजोरी नही महसूस करेंगे। ऐसा अनुभव करंेगे जैसे साकार रूप में सदैव साथ है और हाथ में हाथ है। साथ और हाथ से बुद्वि की लगन सदैव सर्वश्रेष्ठ मत पर स्थिर रहती है। जब सर्वश्रेष्ठ का हाथ अपने उपर रहता है जब हम निर्भय रहेंगे और कोई भी मुश्किल कार्य करने के लिए तैयार हो जायेगे। किसी भी मुश्किल परिस्थिति में विघ्न से घबरायेगे नही। साथ और हाथ के कारण हिम्मत से सामना करेंगे।

कितना भी कमजोर व्यक्ति हो लेकिन यदि सर्वशक्तिमान का साथ और हाथ हो जब कमजोर व्यक्ति में भी शक्ति भर जाती है। कितना भी भयानक दृश्य हो शूरवीर के साथ शूरवीर बन जाते है। परिस्थितियों से घबराने और सामना न कर पाने का प्रमुख कारण सर्वशक्तिमान के साथ और हाथ का अनुभव नही होना है।

जैसे बाप बच्चे का हाथ पकड कर बार-बार सही रास्ते पर लाता है और बच्चा छोड कर भागता है, उसी प्रकार यदि हम भी मन बुद्वि से भागते है। क्योकि हम सर्व शक्तिमान को भूल जाते है और उसका साथ और हाथ छोड देते है। इसके कारण हम उलझन में आकर कमजोर बन जाते है।

माया भी बहुत चतुर है। वार करने के पहले वह साथ और हाथ को छुड़ा कर हमे अकेला कर देती है। जब हम अकेले में कमजोर पड़ जाते है तब ही माया हमारे उपर वार करती है। यदि साथ और हाथ है तब हमे भटकना नही होगा अन्यथा हम अपने को भटकाने वाले निमित्त स्वयं बन जायेगे।

जब सर्व शक्तिमान साथी होता है तब खुमारी में खुशी बढी रहती है। हम समझते है कि हमारा बैकबोन पावरफुल है। इससे खुशी की लहर बनी रहती है। ईश्वरीय खुमारी खुशी की लहर तभी खत्म होती है जब हमारा सम्बन्ध टूट जाता है अथवा हम साथ और हाथ छोड देते है। यदि साथीपन का अनुभव होगा तब हमसे कोई पाप कर्म भी नही होगा, क्योकि पाप कर्म हमेशा अकेले में होता है। हम अनुभव करेगे कि हमे कोई देख रहा है, इसलिए हम चोरी भी नही करेगे। अकेलापन खत्म होने का उदास भी नही होगें। ईश्वरीय शान में न रहने के कारण निर्बल बन जाते है और परेशान हो जाते है। ईश्वरीय शान से परे होने के कारण स्वयं को परेशान कर लेते है।

अव्यक्त महावाक्य बाप दादा मुरली 31 मई, 1972

लेखक : मनोज श्रीवास्तव, सहायक निदेशक सूचना एवं लोकसम्पर्क विभाग उत्तराखंड

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